Tuesday, January 29, 2008

गहरी वेदना

जब भी चाहा उड़ना
काट डाले तुमने पर मेरे
देकर लालच
स्वर्ण आभूषणों का
कैद कर दिया मुझे
स्वर्ण पिंजर में
क्या डरते थे तुम
कि मैं उड़ जाऊँगी
दूर बहुत दूर
तुम्हारी पहुँच से भी दूर
कितना अभिमान है तुम्हे खुद पर
और कर भी क्या सकते थे
तुमने बस पाना सीखा है
नाजायज तरीको से
औरत को अपनी बपौती समझते हो
पैर की जूती
एक फ़ट भी गई
दूसरी आ गई
मगर निर्मोही तुम भूल गये
एक औरत ही है
तुम्हारे जन्म का आधार

नीलकमल

1 comment:

ghughutibasuti said...

अच्छा प्रयास है ।
घुघूती बासूती