Sunday, January 27, 2008

ज्वाला मुखी

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

















मेरे मन में फ़ूटा है जो ज्वालामुखी
छेडो न इसे
जल जाओगे तुम भी
मिल जाओगे लावे में-
दहकते आग के कुएँ मे
न झांको तुम
नाहक ही हाथ जला बैठोगे
मै कौन हूँ इस बात से
तुम्हे सरोकार न हो
तुम कौन है इस बात का
मुझे इन्तजार नही
बस ये जान लो इतना काफ़ी है
तुम्हारे लिये
जो तुम कहो मै सुन सकूँ
जो मै कहूँ तुम भी सुनो
कोशिशे बेकार है
लिखे को कुरेदने की
ये वो रोशनाई है जिसके
कागज फ़ट जायेगा-
शब्द न मिटेंगे कभी
जब दोस्त बन कर बन जाना है
एक अजनबी
तो क्यों न रहें हम अजनबी
तमाम उम्र यारो
क्या सचमुच तुम रिश्ते निभाओगे
क्या दोस्ती का मोल भी चुकाओगे
जब घिर जायेगा अभिमन्यु सा कोई
खुद अपनों के बीच
क्या पहला वार तुम ही चलाओगे?

3 comments:

सुनीता शानू said...

मुझे नही लगता एसा...

डॉ० अनिल चड्डा said...

नीलकमल जी,

प्यार धोखा नहीं, एक सच्चाई है । बस महसूस करने की आवश्यकता है । हाँ, ये अलग बात है कि लोग प्यार में धोखा ज़रूर खाते हैं और देते हैं ।
पर फिर धोखा किस में नहीं हैं । इस दुनिया में धोखा ही धोखा है । पर फिर भी विश्वास तो करना ही पड़ता है न । यदि ऐसा न करें तो जीवन कैसे जियेंगें ।

ghughutibasuti said...

कठिन समय में दोस्ती या प्रेम कुछ भी निभाना कठिन है । कविता अच्छी लगी ।
घुघूती बासूती