जब भी चाहा उड़ना
काट डाले तुमने पर मेरे
देकर लालच
स्वर्ण आभूषणों का
कैद कर दिया मुझे
स्वर्ण पिंजर में
क्या डरते थे तुम
कि मैं उड़ जाऊँगी
दूर बहुत दूर
तुम्हारी पहुँच से भी दूर
कितना अभिमान है तुम्हे खुद पर
और कर भी क्या सकते थे
तुमने बस पाना सीखा है
नाजायज तरीको से
औरत को अपनी बपौती समझते हो
पैर की जूती
एक फ़ट भी गई
दूसरी आ गई
मगर निर्मोही तुम भूल गये
एक औरत ही है
तुम्हारे जन्म का आधार
नीलकमल
Tuesday, January 29, 2008
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1 comment:
अच्छा प्रयास है ।
घुघूती बासूती
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