जब भी चाहा उड़ना
काट डाले तुमने पर मेरे
देकर लालच
स्वर्ण आभूषणों का
कैद कर दिया मुझे
स्वर्ण पिंजर में
क्या डरते थे तुम
कि मैं उड़ जाऊँगी
दूर बहुत दूर
तुम्हारी पहुँच से भी दूर
कितना अभिमान है तुम्हे खुद पर
और कर भी क्या सकते थे
तुमने बस पाना सीखा है
नाजायज तरीको से
औरत को अपनी बपौती समझते हो
पैर की जूती
एक फ़ट भी गई
दूसरी आ गई
मगर निर्मोही तुम भूल गये
एक औरत ही है
तुम्हारे जन्म का आधार
नीलकमल
Tuesday, January 29, 2008
Sunday, January 27, 2008
ज्वाला मुखी


मेरे मन में फ़ूटा है जो ज्वालामुखी
छेडो न इसे
जल जाओगे तुम भी
मिल जाओगे लावे में-
दहकते आग के कुएँ मे
न झांको तुम
नाहक ही हाथ जला बैठोगे
मै कौन हूँ इस बात से
तुम्हे सरोकार न हो
तुम कौन है इस बात का
मुझे इन्तजार नही
बस ये जान लो इतना काफ़ी है
तुम्हारे लिये
जो तुम कहो मै सुन सकूँ
जो मै कहूँ तुम भी सुनो
कोशिशे बेकार है
लिखे को कुरेदने की
ये वो रोशनाई है जिसके
कागज फ़ट जायेगा-
शब्द न मिटेंगे कभी
जब दोस्त बन कर बन जाना है
एक अजनबी
तो क्यों न रहें हम अजनबी
तमाम उम्र यारो
क्या सचमुच तुम रिश्ते निभाओगे
क्या दोस्ती का मोल भी चुकाओगे
जब घिर जायेगा अभिमन्यु सा कोई
खुद अपनों के बीच
क्या पहला वार तुम ही चलाओगे?
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